Sunday, February 19, 2012

तेव्हा एक कर ! -- By नारायण सुर्वे

तेव्हा एक कर !
जेव्हा मी या अस्तित्वाच्या पोकळीत नसेन
तेव्हा एक कर
तू निशंक मनाने डोळे पूस
ठीकच आहे, चार दिवस धपापेल जीव गदगदेल !
उतू जाणारे हुंदके आवर कढ आवर,
नवे हिरवे चुडे भर उगीचच चिरवेदनेच्या नादी लागू नको !
खुशाल; खुशाल तुला आवडेल असे एक नवे घर कर
मला स्मरून कर, हवे तर; मला विस्मरून कर !
--नारायण सुर्वे
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Very well thoughts! ....true love again !
--Sanika
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